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अच्छे दिन !

प्रेशर कुकर की सीटी की आवाज़ से राजन की नींद खुल गयी। कुछ देर वो बिस्तर में लेटा रहा परन्तु जब दाल की ख़ुशबू उसकी नाक में समायी तो उससे रहा नहीं गया। फटाफट उठ कर रसोई की तरफ़ भागा जहाँ उसकी माँ खाना बना रही थी।
वाह माँ,क्या बात है? कोई ख़ास मेहमान आ रहा है जो आज घर में दाल बन रही है? राजन ने अपनी माँ से पूछा।

हाँ राजन,तेरी बहन और जीज़ाज़ी आज आ रहें हैं. अब दामादजी बहुत दिनों के बाद आ रहें हैं तो सोचा आज कुछ ख़ास बनाया जाये। 

बारह वर्षीय राजन को अपनी बहन से मिलने की ख़ुशी तो थी पर उस से ज़्यादा इस बात की ख़ुशी थी कि आज दाल खाने को मिलेगी। एक अरसा बीत गया,दाल की शक्ल देखे हुए. पहले तो माँ रोज़ दाल बनातीं थी , कभी दाल की कचौरी और कभी दाल के दही बढ़े। यह सब सोच कर ही उसके मुँह में पानी आ गया. दाल की ख़ुशनुमा यादें और लुभाना स्वाद उसके रोम रोम में बस गया।

वह बेसब्री से भोजन के समय की प्रतीक्षा करने लगा,खेलने में उसका ध्यान बिलकुल नहीं लग रहा था ।

दीदी और जीज़ाज़ी रोज़ रोज़ क्यों नहीं आते, उनके बहाने प्रतिदिन दाल तो खाने को मिलेगी. जीज़ाज़ी नहीं तो कोई और मेहमान ही आ जाए, माँ को दाल तो बनानी ही पड़ेगी। वैसे तो पिताजी को भी दाल बहुत पसंद है पर दाल तो सिर्फ़ कुछ ख़ास दिन और कुछ ख़ास लोगों के लिए ही बनती है।

दीदी और जीज़ाज़ी आ गये,राजन के लिए वो तोहफ़े भी लाए,उसकी पसन्दीदा चीज़ें मगर उसका ध्यान तो सिर्फ़ भोजन की तरफ़ था. माँ ने दाल को तड़का लगाना शुरू कर दिया । तड़के की ख़ुशबू पूरे घर में भर गयी, सभी के मुँह से लार टपकने लग गयी,भोजन में दाल के परोसने के ख़याल से ही पेट में चूहे कूदने लगे।

डाइनिंग टेबल पर सबकी नज़र दाल पर थी, सबको एक एक कटोरी में दाल परोस दी गयी । थोड़ी सी दाल कटोरे में बच गयी थी जो माँ ने फटाफट जीज़ाज़ी की कटोरी में दाल दी. राजन को उम्मीद थी की वह घर का सबसे छोटा सदस्य है तो बची हुई दाल उसी को दी जाएगी, परन्तु माँ को तो सिर्फ़ दामादजी ही नज़र आ रहे थे।

मेरी भी कभी शादी होगी,मैं भी अपने ससुराल जाऊँगा,मेरी सास भी मुझे प्यार से दाल खिलायेंगीं, राजन के मन में विचार आ रहे थे ।

पर अभी तो मेरी शादी में बहुत समय हैं,कई वर्ष. लगता है तब तक चिकन और पनीर से ही काम चलाना पड़ेगा. यह सोच कर राजन बहुत मायूस हो गया. अच्छे दिन कब आएँगे,वह सोच रहा था.

© All rights reserved Ravi Dhingra 

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